प्रिय आत्मीय जनों
सादर प्रणाम 🙏🏻
आज एक कहानी कहने का मन है
राम चंद्र जी सीता जी के वियोग में वन वन भटक रहे है
हे खग मृग, हे मधुकर श्रेणी,
तुम देखी सीता मृग नैनी
इतने बदहवास हो गए कि पशु पक्षियों वृक्ष लताओं भौरों से पूछ रहे है कि क्या तुमने मेरी सीता को कहीं देखा है ?
ऐसे में सती जी, भोले नाथ से प्रश्न करती है कि तुम इन्ही राम की पूजा करते हो !! और बताते हो कि ये ब्रह्म है
जौ नृप तनय त ब्रह्म किमी, नारि विरह मति भोर
जब ये किसी राजा के बेटे है तो ब्रह्म कैसे, (क्योंकि ब्रह्म तो अजन्मा होता है)
फिर एक नारी के वियोग में ये साधारण मनुष्य की भांति व्याकुल हो रहे है
शिव जी ने सती जी को समझाया कि मेरे कहे पर संदेह मत करो, ईश्वर के प्रति विपरीत बातें न करो इसमें तुम्हारी भलाई नही है 👇🏻
मोरे कहे न संशय जाहीं
विधि विपरीत भलाही नाहीं
किंतु सती जी को हठ था कि तुम्हारी बात हम कैसे मान ले
बहुधा पत्नियों को जैसा हो जाता है 😁
तब हार कर या यों कहें कि खीझ कर शिव जी बोले आप जाओ जाकर खुद ही परीक्षा ले लो
सांच को आंच क्या
जो तुम्हरे मन अति संदेहू
तौ किन जाई परिछा लेहू
सती जी, सीता जी का रूप बना कर राम जी के सामने प्रगट हुई,
राम जी जो स्वयं परब्रह्म है तत्काल जान गए और उनको प्रणाम कर बोले
“मां आपने यहां आने का कष्ट क्यों किया”
ऐसे समय में भी धीर पुरुष अपना विवेक सम्हाल लेते है
वो जान सके कि ये पत्नी रूप में तो है लेकिन पत्नी नही है
सती जी संतुष्ट होकर वापस आ गई
किंतु शिव जी अब तक असंतुष्ट हो चुके थे
पत्नी , वो भी संशय करे !!
चलो संशय करे तब भी ठीक ,
समझाने पर भी न माने
परीक्षा लेने के लिए कहा,
तब भी विश्वास करना चाहिए था, कि बात में दम होगी तभी सामने वाला व्यक्ति कह रहा है कि आप जाकर खुद चेक कर लो
सती जी के वापस आने पर शिव जी ने सती जी को कहा कि आपने सीता जी का रूप बनाया है और उनको मैं मां के समान मानता हूं
तो आज से आप मेरे लिए त्याज्य है
सती जी रूष्ट हो गई और, ऐसे में मायके से अचानक बुलावा भी आ गया पिता दक्ष प्रजापति जी का
“बड़ा हवन यज्ञ करवा रहा हूं आ जाओ”
सती जी बोली शिवजी से कि “चलो”
किंतु शिव जी ने इंकार कर दिया
“मुझे तो बुलाया नही , आपको बुलाया है आप ही जाओ”
रूठी तो सती जी पहले से थी मायके में अपनो के बीच मन बदल जायेगा, जब तक लौट कर आऊंगी तब तक शिव जी का गुस्सा भी थोड़ा कम हो जायेगा
ये सब सोच कर चली गई
क्या शिव जी के त्याग देने से सती जी का उनसे प्रेम कम हो गया था ? बिलकुल नहीं
मायके में ज्यों ही उनके पति देव के विरुद्ध कुछ बोला गया तो रोष में सती जी हवन कुंड में कूद पड़ी
क्या सती जी के परीक्षा लेने मात्र से शिव जी ने सती जी को त्याग दिया था ?
बिलकुल नहीं !!
अगर ऐसा होता तो सती जी की मृत देह लेकर पागलों के समान शिव सब जगह क्यों घूमते
वो क्या अवस्था थी,
क्या वो अवस्था राम जी की अवस्था से भिन्न थी ?
काश सती जी इस अवस्था को देख पाती !!
इतना प्रचंड क्रोध शिव जी का, कि यदि उस समय सती जी के निर्जीव शरीर को उनके कांधे से कोई उतारने मात्र की कोशिश भी करता तो उसका परिणाम सोचा नहीं जा सकता था
विष्णु जी ने धीरे धीरे से सती जी के अंग, सुदर्शन चक्र से काट काट कर गिराए
और जहां जहां वो अंग गिरे वही आज 51 शक्ति पीठ है
शिव जी और सती मां का प्रेम अमर है
किंतु एक छोटे से हठ और बात न मानने से दोनो के जीवन में इतना बड़ा मोड़ आ गया
तो सभी आत्मीय जनों से निवेदन से सामंजस्य और आपसी समझ से जीवन नैया को चलाए 🙏🏻
अस्तु……
भगवान सब को विवेक प्रदान करे 🙏🏻
~~~ प्रभात पांडेय
