चाहे सांसारिक जीवन हो या आध्यात्मिक जीवन, हम सभी केवल सुख पाना चाहते हैं।
सुख से आप क्या समझते हैं?
ऐसा माना जाता है कि अगर संतुष्ट हो गए तो विकास रुक जाएगा, विकास हुआ तो आप असंतुष्ट हो जाओगे।
हमने कई ऐसी कहावतें सुनी हैं जहां लोग सुख और दुख को एक दूसरे के साथ जोड़ते हैं जैसे :- सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, बिना दुख भोगे सुख नहीं मिलता, दुख के बाद ही सुख का मजा आता है आदि।
परंतु जो हम अब तक सुनते आए हैं, वह कितना सच और सटीक है?
जो सुख है वह केवल सुख देता है,
जो दुख है वह केवल दुख देता है,
सुख और दुख अलग अलग परिभाषा हैं।
प्रत्येक मनुष्य निरंतर सुख की चाहना करता है।सुख या दुख आपका चुनाव है।हम सुख को निरंतर ग्रहण करना चाहते हैं।
इस सुख की चार अलग अलग प्रकार की परिभाषा है :
१) इंद्रिय आधारित सुख : यह सुख व्यक्ति को सबसे ज्यादा चाहिए। जैसे स्वाद, स्पर्श, गंध आदि।
२) संबंध आधारित सुख : हम परिवार से अपेक्षा रखते हैं कि वह हमें सुख दे। मेरा घर, मोहल्ला, जाति, शहर और देश से मुझे सुख मिले। इनसे लगातार हमें कुछ पाने की चाह होती है।
३) लक्ष्य आधारित सुख : किसी चीज को पाने का लक्ष्य, भौतिक सुख का लक्ष्य, कैरियर और पैसा कमाने का लक्ष्य। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति सुख की कामना करता है।
४) मूल्य आधारित सुख : जब व्यक्ति समाज के लिए, गरीबों के लिए या समाज सेवा में खुद को जोड़ता है तो वहां से भी वह सुख की चाहत रखता है। ऐसा करने से उसके मन को खुशी मिलती है।
इस सुख को प्राप्त करने की भी प्रक्रिया है। यह दो तरीके हैं जिससे आप सुख की प्राप्ति कर सकते है।
१) सुख प्राप्ति ईश्वर प्राप्ति करने से हो सकती है, जिसमें भक्ति, विरक्ति और त्याग आता है।
२) भौतिक वस्तुओं में सुख है। अधिक से अधिक सुविधाओं को इक्ट्ठा करे और उसका भोग इतना कर ले कि मन को फिर उसकी इच्छा ही न हो।
अक्सर सुख प्राप्ति में त्याग टिक नहीं पाता और व्यक्ति भोग की तरफ चला जाता है।
बहुत से भोगी सन्यासी भी हुए हैं क्योंकि उन्होंने इतना भोग कर लिया कि अब उनको इसकी इच्छा नहीं।
प्रायः व्यक्ति भोग से मुक्ति की तरफ या मुक्ति से भोग की तरफ भागता है। यह रास्ता भी गलत है इससे संसार चलाना ठीक नहीं है।
तो फिर इन सब में सामंजस्य कैसे स्थापित करें?
मध्यम मार्ग उत्तम है : विवेकपूर्ण रूप से सुख का भोग करें। इसके लिए सभी भ्रांतियों को तोड़ना होगा।
हमारा सम्पूर्ण जीवन तीन चीजों में खत्म हो जाता है : भूत की पीड़ा, वर्तमान का विरोध और भविष्य की चिंता।
अगर आप इंद्रिय सुख की तरफ भागेंगे तो वह भूसे में आग लगाने जैसा है जो लगातार बढ़ती रहती है। वहां आप फंस जायेंगे।
सुख तो इसी बात में है कि हम जीवित है। वरना हम जीवन ऐसे जी रहे हैं जैसे अपना ही खून पी रहे हों।
जब यह समझ आ जायेगा तो जीवन भी समझ आ जायेगा।
हमने सुख को तुलना के हाथ चढ़ा दिया है। हम सदैव अपने सुख की तुलना दूसरों के सुख से करते हैं।
सुख लेने के लिए एक आवश्यक चीज है और वह “मन” है। हमारे सुख का निर्धारण हमारे मन से होता है, मन के लिए होता है और मन के कारण होता है।
फिर भी सुख प्राप्ति की कुछ प्रक्रियाएं हैं :
१) अस्वादन : सुख को ग्रहण करना। ऐसा क्या चाहिए जिससे हम सुख प्राप्त करें।
२) चयन : सुख कैसे और किस रूप में चाहिए।
३) चित्रण : मन में उसकी एक छवि, एक कल्पना है कि वह सुख कैसा होगा।
४) विश्लेषण : जितना भी ज्ञान था उसके अनुरूप सुख कैसा होगा, यह कौन बताएगा? यह कोई ऐसा जानकार व्यक्ति ही बताएगा जिसे इसके सभी कार्य और कारण पता हों।
५) तुलना : हमारा सुख दूसरे के सुख के रूप में कितना बेहतर है। यह भाव “काश ऐसा होता” जब आता है तो तुलना के कारण आपके सभी सुख प्राप्ति की योजना बेकार हो जाती है। जो चीज कुछ समय पहले आपके लिए उत्तम सुख थी वह क्षण भर में खत्म हो जाती है।
क्योंकि प्रत्येक वस्तु अपने में अनोखी और मूल्यवान है इसलिए उसकी तुलना बेकार है।
गीता में भगवान ने कहा है : सुख हो या दुख, एक समान जीना चाहिए।
“सुख आता है आने दो, दुख आता है आने दो।” इस भाव में जीना सीखें।
सुख दुख में समान रहने की कोशिश करें।
दुख एक भ्रांति है।
सुख का अपना एक अस्तित्व है।
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……………………………. प्रभात पाण्डेय…………….
