धर्म और अध्यात्म की बाढ़ और आँधी दोनों एक साथ आई हुई हैं
जिधर देखो उधर सब लोग किसी ना किसी प्रकार से धार्मिक दिख रहे हैं
यहां अगर हम सब ईमानदारी से सोचे या खुद को ही देखे, तो धर्म मतलब क्या ??
किसी मूर्ति , मंदिर , नदी ,कर्मकांड , हवन , जाप , तीर्थयात्रा आदि से जुड़ना !!
लेकिन और गहराई से सोचे कि वहां भी हम क्या करते है ?
वहां हम अपने किसी स्वार्थ की सिद्धि की कामना करते है
मेरी नौकरी लग जाये
मेरे को पैसे मिल जाये
मेरी शादी हो जाये
ऐसी अनेकों कामनाएँ बाद मे हम करते है
ये धर्म है ???
फिर व्यापार क्या है ??
हम पैसा देते है , फिर सामान मांगते है
यहां भी वही है !!
हम पूजापाठ करते है फिर बदले मे कुछ मांगते है
चलो आज कुछ चीजों को ठीक से समझते है
3 डंडे की एक सीढ़ी है
कुल मिलाकर 5 तल
पहला जमीन
फिर 3 डंडे
फिर छत
तो जो जमीन है वो पूर्ण सांसारिकता है
खाओ पियो मस्त रहो
कहीं कोई भगवान नहीं , कोई अगला जन्म नहीं , कोई कर्म फल आदि नहीं
पहला डंडा मानवीय गुणों का है
संसार से जब ऊपर उठते है तो मानवीय गुण पहले आने आवश्यक है
उसमे भी एक पैर जमीन पर दूसरा पैर पहले डंडे पर होगा, तो आप सांसारिकता के साथ साथ परोपकारी व्यक्ती भी होंगे
जब दोनों पैर पहले डंडे पर होंगे तो उस समय ठीक ठीक रूप मे हम मानव होंगे ,
सभी की भलाई हो , किसी को हम कष्ट ना दें , सर्वे भवन्तु सुखिनः…. की भावना हम में आ जाती है
अब अगला पायदान धर्म है
यहां पर भी एक पैर पहले डंडे पर और दूसरा पैर दूसरे डंडे पर …
यानी मानवीय गुणों के साथ साथ हम धर्म को भी पकड पाए !
अभी दूसरा पैर नीचे ही है
यहां एक बात ध्यान से समझने की है , कि जमीन से सीधे दूसरे डंडे (धर्म) पर पैर रख पाना सम्भव नहीं है
और हम सभी लोग अगर ध्यान से देखें तो हर कोई बिना मानवीय गुणों के सीधा धार्मिक बनने की होड़ मे लगा है
ये नितांत आडंबर है, ढोंग है
धार्मिक होने से पहले आपको मानवीयता गुणों से भरपूर होना ही पड़ेगा
यदि आप अच्छे इंसान नहीं है तो आप धर्मिक हो ही नहीं सकते
अब बात करते है धर्म से ऊपर एक डंडा और है उसको आध्यात्मिकता कहते है
अध्यात्म मतलब अपनी आत्मा के निकट …
ये जान पाना कि मैं मात्र शरीर नहीं हूं, आत्मा हूं
इसके लिए अपनी आत्मा के निकट जाना पड़ेगा
ये एकाएक होने वाली चीज़ नहीं है
जैसा कि सोशल मीडिया पर ध्यान की बाढ़ आई हुई है, सब के सब आध्यात्मिक हो रहे है और मन मे, जीवन में, कलह भरी पडी है
जब दोनों पैर ठीक से धर्म के डंडे पर जम जाये, तो एक पैर उठा कर आध्यात्म के तीसरे डंडे जबकि एक पैर अभी धर्म के डंडे पर ही है
यानी धर्म कर्म भी, और ध्यान धारणा भी , दोनों साथ चलेगी
यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात है, कि अब पहला डंडा बिल्कुल छूट चुका है
यानी अब मानवीय गुणों से आप परे हो
यही कारण है लोग घर परिवार त्याग कर धर्म मे आते है
उसका कारण यही है , वो अगले डंडे पर आ चुके है संसार पीछे छूट चुका है
कुछ समय बाद जब दोनों पैर अध्यात्म के डंडे पर आ जाते है तो फिर कर्म कांड , तीर्थ , हवन आदि सब छूट जाता है
आत्म अवलोकन ही बचता है
और फिर आती है अंतिम स्थिति जब एक पैर छत पर और एक पैर तीसरे डंडे पर
लेकिन सावधान !!
यही वो समय है जब अक्सर सीढ़ी फिसल जाती है और लोग धड़ाम से मुह के बल नीचे गिरते है , लहूलुहान हो जाते है। संसार उनको फिर पकड़ लेता है
विरले होते है वो लोग जो दूसरा पैर भी छत पर रख देते है और मुक्ति का, आनंद , परमानंद का स्वाद चखते है
अस्तु …..
हम सभी धर्म और अध्यात्म को ठीक से समझे और पहले अच्छे मानव बने .. 🙏🏻
~~~प्रभात पांडेय
