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समर्पण

गीली कच्ची मिट्टी समर्पित होती है..

अपने मूर्तिकार के प्रति ..

अपने कुम्हार के प्रति …

मुझे रौंदो, पीटो, मुझसे कंकड़ निकाल कर मुझे चाक पर रख कर भले ही चकरघिन्नी बना दो,

पर मुझे मालूम है तुम मुझे कोई आकार जरूर दोगे 🙏🏻

उसको आकार भी मिलता है लेकिन भट्ठी में जलने के बाद !!

इतना समर्पण पत्थर में नहीं होता…

वो तो मूर्तिकार की, उस पर नजर पड़ गई ,
उसको दिख गया कि इसमें संभावना है !!
कुछ बेहतर गढ़ा जा सकता है

लेकिन पत्थर समर्पित नही है वो झुका नही है !!

तो अब छेनी हथौड़े चलाने के अलावा कोई रास्ता बचा ही नहीं है

अब जो पत्थर उसके सामने टिकता है, लंबे समय तक चोटें सहता है ,

वो मूर्ति बनता है,
पूजा जाता है

जो चोटों में बिखर जाता है
वो सड़क किनारे उपेक्षित पड़ा रहता है
अनगढ़

तीसरे प्रजाति के लोग और भी हैं
रेत के जैसे….

मूर्तिकार तैयार है बनाने को,

पर रेत में नमी की कमी है..

जैसे तैसे मीठी बातों का पानी, रेत में डाल कर मूर्तिकार उसको राजी करता है
मूर्ति बनने के लिए…

लेकिन अधबनी मूर्ति ही बिखर जाती है
नमी के अभाव में, नम्रता के अभाव में !!

मूर्तिकार चाह कर भी उसको गढ़ नहीं पाता,

क्योंकि रेत समर्पित ही नही होना चाहती

हम सब भी इन्ही तीनो में से कोई न कोई है

कुछ तय हम करें,
कुछ मूर्तिकार को करने दें,
कुछ समय चक्र पर छोड़ दें

अस्तु ……

भगवान हम सब पर कृपालु हो 🙇🏻‍♂🙇🏻‍♂

                ~~~प्रभात पांडेय
           

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