पदम् पुराण के एक श्लोकानुसार…
जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रूद्र संख्यक:।
पक्षिणाम दश लक्षणं, त्रिन्शल लक्षानी पशव:, चतुर लक्षाणी मानव:।।
-(78:5 पद्मपुराण)
अर्थात
9 लाख बार जलचर
20 लाख बार स्थावर अर्थात पेड़-पौधे
11 लाख बार सरीसृप, कृमि अर्थात कीड़े-मकौड़े
10 लाख बार पक्षी/नभचर
30 लाख बार स्थलीय/थलचर
और शेष 4 लाख मानवीय नस्ल के मिलते है
कुल 84 लाख।
एक प्रचलित मान्यता के अनुसार एक आत्मा को कर्मगति अनुसार 30 लाख बार वृक्ष योनि में जन्म होता है।
उसके बाद जलचर प्राणियों के रूप में 9 लाख बार जन्म होता है।
उसके बाद कृमि योनि में 10 लाख बार जन्म होता है।
और फिर 11 लाख बार पक्षी योनि में जन्म होता है।
20 लाख बार पशु योनि में जन्म के बाद अंत में गाय का जन्म मिलता है
उसके बाद 4 लाख बार मनुष्य योनि में क्रमिक विकसित मनुष्य के रूप में जन्म मिलता जाता है
अंतिम जन्मों में मन पूर्ण आध्यात्मिक प्रकृति का हो जाता है
उसके बाद देव योनि में जन्म लेना होता है
मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद अत्यंत नीच कुकर्म करने पर ही उल्टा क्रम यानी दुर्गति शुरू होती है
अर्थात मनुष्य योनि से पिछली योनि में भेजा जाता है प्रायः ऐसा नहीं होता किन्तु अगली मनुष्य योनि मे कष्ट दुःख गरीबी आदि होती है
अतः मनुष्य योनि का बहुत सावधानी से प्रयोग करना चाहिए
लाखों जन्मों के बाद ये स्वर्णिम अवसर हमारे हाथ लगा है इसको बेकार ना जाने दें
अस्तु….
भगवान हम सब को शुद्ध विवेक प्रदान करे 🙇🏻♂
~~~ प्रभात पांडेय
