गीता जी के अध्याय 4 के 39 श्लोक में ये लाइन आई है
इस श्लोक का पूरा अर्थ इस प्रकार है
“वे जिनकी श्रद्धा अगाध है और जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लिया है, वे दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। इस दिव्य ज्ञान के द्वारा वे शीघ्र ही कभी न समाप्त होने वाली परम शांति को प्राप्त कर लेते हैं।”
श्रद्धा का आशय असंशयपूर्वक पूर्ण समर्पण से है, जो साधक श्रद्धावान और आत्म-विश्वासी हैं, उनके जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं रहता
लेकिन हममें से कई लोगों ने अंधश्रद्धा शब्द कई बार सुना होगा
अब ध्यान से सोचें तो श्रद्धा और अंधश्रद्धा में क्या फर्क है
तथाकथित ज्ञानी बोल सकते है जहां चमत्कार घटित हो रहा हो वहां श्रद्धा और जहां बिना किसी चमत्कार को देखे हम समर्पण कर रहे है वो अंधश्रद्धा
किंतु ये बड़ी खोखली परिभाषा लगती है चमत्कार हर क्षण आपके शरीर पर घटित हो रहे है
कोई ऐसी मशीन आज तक नहीं बनी जिसमें खाना डाल दो और उसमे खून बन जाये
ऐसा पम्प आज तक नहीं बना जो बिना रुके 80 साल तक कुछ पम्प करता रहे
सैकड़ों चमत्कार हमारे साथ रोज हो रहे है लेकिन उनको देखने के हम इतने आदी हो गये हैं कि हमे वो चमत्कार नहीं लगते
दूसरी तरफ भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि, “हे अर्जुन, तुम जिस पर भी श्रद्धा करोगे, मैं उसी के माध्यम से तुम्हारी मदद करूंगा।”. इसका अर्थ है कि तुम्हारी श्रद्धा जिस भी रूप में हो, चाहे वह मेरा हो, किसी अन्य देवता का हो, या किसी अन्य व्यक्ति का, मैं उस श्रद्धा के माध्यम से तुम्हें मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करूंगा।
तो बिल्कुल सीधा रास्ता मिल गया आपको
चाहे किसी पर भी पूर्ण समर्पित हो जाओ भगवान कृष्ण ही उस व्यक्ति के माध्यम से आपकी सहायता करेंगे
इसमें कुछ भी संशय नहीं है
तो कुल मिला कर समझे कि अंधश्रद्धा नाम की कोई चीज़ नहीं होती
जिस पर भी आप अपने विश्वास को पूर्णतः के साथ लगाओगे वहां से ही आपको रास्ते मिल जाएंगे
अस्तु….
हम सभी के जीवन मे सरलता सहजता और श्रद्धा उत्पन्न हो 🙏🏻🙇🏻♂
~~~प्रभात पांडेय
