गुरु के ढूढने पर सबने बहुत बात की लेकिन शिष्य कैसा हो ये किसी ने नहीं पूछा !
गुरु की उपमा कुम्हार से दी जाती है, तो इस आधार पर शिष्य को घड़ा मान सकते है, जो सबको शीतल जल देता है
तो आज समझते है कि शिष्य में क्या गुण हो
शिष्य तो कोरी मिट्टी है कुम्हार खोजता है सही मिट्टी
ना कि मिट्टी खोजती है कुम्हार , ( जैसा कि कई लोग कहते है सही गुरु कैसे ढूंढे)
मिट्टी चाहे भी तो कुम्हार को ढूंढ नही सकती,
उसके बस में तो सिर्फ अपने गुणों को बढ़ाना है
जिस दिन मिट्टी काली और चिकनी दिखेगी, कुम्हार खोद ले जाएगा
तो खुद में बेहतर बनने का प्रयास करो, गुरु चल कर तुम्हारे पास आयेंगे और तुमको ले जायेंगे
अब कुम्हार मिट्टी को ले जा कर करता क्या है ?
उस मिट्टी को जल में भिगो देता है गुरु पहले शिष्य को जलपान कराता है
शिष्य भी बड़ा खुश है, लेकिन अगले दिन ही कुम्हार उसको पैरो से रौंदता है और जो भी छोटी मोटी कंकड़ी उसके पैरो में चुभती है उनको निकाल कर के अलग कर देता है
शिष्य की एक एक विकृति चुनकर अलग करना गुरु का सबसे पहला काम है
लेकिन किसी को भी पैरो से रौंदा जाना मंजूर नहीं है
हमे तो वो गुरु चाहिए जो मंच से ऐलान करके नाम दान करदे हमे वो गुरु चाहिए जो सिर्फ हमे सराहे
सही गुरु को आप जानबूझ कर पकड़ना ही नही चाहेंगे क्योंकि वो आपको आपके व्यक्तित्व को रौंदेगा
अभी तो मिट्टी की केवल विकृति निकली है
अभी तो और काम बाकी है !!
अब दूसरे दिन तक के लिए उस मिट्टी को धूप में उपेक्षित पड़ा छोड़ दिया जाता है, जो कीचड़ नुमा मिट्टी है वो थोड़ी ठोस हो जाए
क्या हम इस तरह तपने के लिए, उपेक्षा के लिए, तैयार है ?
अब अगली बारी आती है मिट्टी को नरम करने की,
कुम्हार उस मिट्टी को छोटे मुगदर या थापी से पीटता है
पलट पलट कर पीटता है ,
मिट्टी निर्दोष है ,
सारी विकृति निकल गई है ,
फिर भी पिट रही है …. !!!
कई बार उसके मन में भी आता है कि सीधे, सरल, सज्जन, आध्यात्मिक व्यक्तित्व का होना ही बुरा है,
बिना कारण मुझे इतना दुख मिल रहा है
पर मेरे भाई यही निर्माण की प्रक्रिया है
अब मिट्टी को भ्रम हो सकता है कि मैं निर्मल हूं,
विकृति रहित हूं ,
अन्य मिट्टी से श्रेष्ठ हूं
मैं मोक्ष के लायक हूं
पर अभी ठहरो !!
ये तो मात्र निर्माण से पहले की तैयारी थी
तुम किस भूल में हो ?
अब गुरु कृपा की बारी है
कुम्हार मिट्टी को चाक पर रखता है, शिष्य को अब साधना के बारे में सही से बताने का समय आ गया है
चाक पर मिट्टी चकरघिन्नी सी नाचती है
शिष्य का दिमाग काम नही करता कितनी कठोर नियम धर्म है दिमाग चकरघिन्नी सा हो जाता है
ऐसे समय में गुरु कुम्हार मिट्टी के अंदर अपना एक हाथ घुसा देता है और दूसरे हाथ से बाहर की आकृति गढ़ने लगता है
कुछ रहस्यमई परिवर्तन मिट्टी में होने लगते है
अब वो हवा में उड़ने वाली धूल नही है, वो एक सुंदर आकृति है
कई बार इस समय भी घमंड आ जाता है और पात्र बनते बनते रह जाता है और कुम्हार उसको फिर से समेट कर मिट्टी का लोंदा बना देता है
गुरु के हाथो में खुद को जिसने सौंप दिया वो सुपात्र बन ही जाता है
लेकिन मुक्ति अभी दूर है अभी घड़ा कच्चा है
अभी तो तपना बाकी है
मुख्य तपस्या अभी बाकी है
अन्य साधकों के साथ बैठ कर भट्ठी में तपना और सुरक्षित बाहर निकलना ये भी एक कठिन परीक्षा है
कई घड़े इस प्रक्रिया में चटक जाते है और कई टूट भी जाते है
बहुत सहन शीलता की आवश्यकता होती है शिष्य बनने के लिए
हम शिष्य बनते है सिर्फ अपनी कोई मनोकामना पूर्ती के लिए
और जब वो कामना पूर्ति नहीं होती तो गुरु हमे बेकार लगता है हम किसी दूसरे की तलाश में चले जाते है
याद रखिए गुरु कभी आपकी मनोकामना पूर्ति नहीं करेगा
आप जब कामना रहित हो ,
समर्पित हो,
गुरु जैसा जो करे
उसके करने में राजी हो
तभी आप शिष्य है
नही तो आप एक ऐसे चमत्कारी आदमी को ढूंढ रहे हो, जो आपकी किसी सांसारिक समस्या से आपको छुटकारा दिला सके
ऐसे में न वो गुरु है, ना ही आप शिष्य
शिष्य हो पाने की पात्रता विकसित कर पाना भी अपने में बहुत बड़ी बात है
अस्तु….
आज कुछ कठोर शब्द कहे उसके लिए सभी से क्षमा 🙏🏻🙇🏻♂
…………………… प्रभात पाण्डेय………….
