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यम से समाधि तक

ऋषि पतंजलि ने जो अष्टांग योग यानी आठ अंग योग के बताये हैं, उनके अनुसार

पहला अंग ~ यम ~

इसके अंतर्गत 5 बातें आती हैं

  1. सत्य
    अधिकांश समय सच बोलें, गलती को सहज स्वीकार करें और उसको दुबारा ना करने का संकल्प लें। इससे अपने व्यक्तित्व में निखार आएगा और झूठ बोलने की प्रवृति कम होगी।
  2. अहिंसा
    किसी को भी दुःख देने का भाव हिंसा है। इसके 3 तरीके हैं – मनसा, वाचा, कर्मणा। जब हम मन ही मन किसी का अहित सोचते हैं, उसका बुरा हो जाये ऐसी भावना रहती है तो वह भी हिंसा ही है। और दिन भर हम अपनी वाणी से किसी ना किसी को दुःख पहुंचाते ही रहते हैं। ये वाचिक हिंसा है। ध्यान में आगे बढ़ने के लिए ये अत्यंत आवश्यक है कि हम मानसिक, वैचारिक और शारीरिक तीनों तरह की हिंसा से बचें।
  3. अस्तेय
    मन से, वचन से, कर्म से चोरी ना करना अस्तेय कहलाता है।
    किसी की वस्तु मुझे मिल जाये, ऐसी भावना रखना भी चोरी है। किसी को किसी गलत कार्य के लिए उकसाना, ये भी चोरी है।अपने ही घर में चुपके से कुछ अकेले बिना बांटे खा जाना, ये भी चोरी है। अस्तेय का अर्थ है – मैं मन वचन कर्म से कोई चोरी नहीं करूंगा।
  4. अपरिग्रह
    अपरिग्रह बताता है कि आपको ईश्वर पर भरोसा है। चीजें इकट्ठा करना संकेत देता है कि अभी आपको केवल अपने सामर्थ्य पर ही भरोसा है। उतना ही रखिए जितने की अति आवश्यकता हो। 5.ब्रह्मचर्य
    चूंकि मनुष्य की इच्छायें असीम हैं तो जैसे उसने हाइब्रिड बीज बना दिए कि किसी भी मौसम में बोने पर वो अंकुरित हो जाएगा ठीक वैसे ही उसने अपनी प्रकृत्ति भी कर ली। वो कभी भी काम भाव में उतर जाता है। यही ब्रह्मचर्य का टूटना है। दूसरा मानसिक रूप से काम भाव में जीना भी ब्रह्मचर्य का टूटना है। काम से भागना नहीं है, काम से निवृत्त होना ही ब्रह्मचर्य है।

दूसरा अंग ~~ नियम
इसके भी 5 भाग हैं

  1. शौच
  2. संतोष
  3. तपस
  4. स्वाध्याय
  5. ईश्वर प्रणिधान
    1 शौच : –
    साधारण अर्थों में शरीर को बाहर और अंदर से स्वच्छ करने को शौच कहते हैं। बाह्य स्नान से तो शरीर बाहर से साफ़ हो जाता है किन्तु अंदर से साफ़ करने के लिए वमन, विरेचन, वस्ती, नेती आदि का प्रयोग किया जाता है। किन्तु इतने मात्र से शौच पूर्ण नहीं होता। प्रतिदिन मन को भी स्नान कराना है। इसको करने के लिए तीन चीजें करनी आवश्यक हैं। प्रसन्नता, क्षमा और कृतज्ञता। प्रतिदिन दिल से प्रसन्नचित्त रहना है। किसी ने कुछ अनुचित कहा उसको मन से क्षमा करना है। हर दिन ईश्वर को हर चीज़ के लिए धन्यवाद देना है, आपके लिए कोई भी कुछ सहयोग करे, उसको दिल से धन्यवाद देना है।
  6. संतोष
    नियम के अंतर्गत आने वाला ये दूसरा भाग है। आज पूरी दुनिया के प्रत्येक मनुष्य के मन में जो उथल पुथल मची है, उसका सबसे बड़ा कारण असंतोष ही है। खुद पर केंद्रित होकर, हर मिली चीज़ के प्रति ईश्वर को धन्यवाद देते रहिए, यही संतोष प्रदान करेगा। संतुष्ट शरीर में ही ध्यान की संभावना बनती है।
  7. तपस
    तपस्या शब्द से ही तपस बना है। इसका सामान्य अर्थ है, अपनी कुप्रवृत्तियों का जलना। अपने मन को मारना ही तपस्या है। हम कुछ घंटे मौन रह कर तपस्या की शुरुआत करें। मौन मन से भी हो और मुँह से भी हो। उस दौरान विचारों को आने दें और जाने भी दें। ना विचारों का विरोध करें, ना उनके साथ बहें। बस मात्र देखें। इस अभ्यास के बाद आप अपनी अन्य कुप्रवृत्तियों पर भी इसी प्रकार अभ्यास कर सकते हैं।
  8. स्वाध्याय
    साधारण अर्थों में इसका अर्थ है, अपने शास्त्रीय ग्रंथों को रोज कुछ देर पढ़ना। हर किसी को गीता अवश्य पढ़नी चाहिए। भले ही एक श्लोक रोज पढ़ें। गीता सभी ग्रंथों का निचोड़ है। स्वाध्याय के नाम पर पश्चिम दर्शन का अध्ययन कृपया शुरू में ना करें। वो दर्शन अत्यंत तार्किक, सरल है जो आपके मस्तिष्क में इस तरह बैठ जायेंगे कि सनातन ग्रंथों को फिर आप पढ़ और समझ ही नहीं पाओगे। स्वाध्याय का गूढ़ अर्थ है स्व यानी खुद का अध्ययन। खुद को समझने के लिए गीता से बढ़िया कुछ भी नहीं है।
  9. ईश्वर प्रणिधान
    प्रणिधान का अर्थ होता है पूर्ण समर्पण, अपने प्राणों को न्योछावर करने का भाव। ईश्वर को हम सब कुछ समर्पित कर सके! हर साँस में उनका स्मरण हो ! अधिकांश समय मन ही मन उनका नाम जप हो! हम जो भी कार्य करें, उसमें कर्ता भाव ना हो! ईश्वर का कार्य, ईश्वर की इच्छा से, ईश्वर के लिए करने का भाव हो। आप जो भी काम करें, उसमें इस चिंतन को बनाए रखें कि मैं ईश्वर का दास हूं, मैं जो काम कर रहा हूं, वो ईश्वर का दिया हुआ है, मुझे इसको भली भांति करना है। बहुधा लोग पूजा के समय अनेकों चीजें भगवान से मांगने लगते हैं। इसका अर्थ है कि आप भगवान का अपमान कर रहे हो। ईश्वर जो भी परिस्थिति दे, उसमें प्रसन्न रहना ही ईश्वर प्रणिधान है। तीसरा अंग ~~~ आसन
    अष्टांग योग में आसन का अर्थ मात्र स्थिर सुखासन से है। हम किसी भी आसन में बिना हिले डुले शांत भाव से लंबे समय तक बैठे रहें, इसका अभ्यास ही आसन है। इसको 2 मिनट से शुरु करें और धीरे धीरे बढ़ाते हुए 5 मिनट, फिर 10 मिनट और अंत में 36 मिनट तक ले जायें। चौथा अंग ~ प्राणायाम
    प्राणायाम, प्राण + आयाम शब्द से बना है। प्राण यानी जीवनी ऊर्जा जो सांसों के माध्यम से अंदर आती है। और आयाम का अर्थ है amplitude यानी किसी मध्य बिंदु से एक ओर चली गई अधिकतम दूरी।अधिकतम हम कितनी गहरी साँस ले सकते हैं और अधिकतम हम कितनी लंबी साँस छोड़ सकते हैं, ये प्राणायाम का मूलभूत स्वरूप है।आप नाड़ी शोधन प्राणायाम, रामदेव जी को ठीक से देख समझ कर करने का प्रयास कीजिए।
    पांचवां अंग ~~~~ प्रत्याहार
    प्रत्याहार दो शब्दों से मिलकर बना है प्रति + आहार अर्थात भोजन के विमुख। इसका अर्थ है, इन्द्रियों और मन का आहार से दूर होना। विषय, भोग, कामनाएँ कभी समाप्त नहीं होती, उनसे अपने को दूर करना ही प्रत्याहार कहलाता है। प्राणायाम से नाड़ी शुद्धि होती है, उससे ही विषय पर पकड़ कमजोर होती है। प्रत्याहार में हमें विवेक और अनुशासन का सहारा लेना पड़ता है।

छठवाँ अंग ~~~~ धारणा
ध्यान की प्रारंभिक अवस्था धारणा है।
ये धृ धातु से बना है
जिसका अर्थ होता है पकड़ना, किसी एक विषय, विचार या वस्तु को। सांसों पर लगातार ध्यान देना या मस्तक पर किसी बिंदु पर ध्यान देना, आते जाते विचारों पर ध्यान देना या सामने रखी किसी वस्तु, चित्र आदि पर लगातार कुछ समय तक ध्यान टिकाये रखना, धारणा कहलाता है। धारणा से अचानक ही किसी दिन ध्यान शरीर में उतरता है। धारणा का लगातार अभ्यास ही ध्यान को बुलाने में सहायक है।

सातवां अंग ~~~~ ध्यान
ध्यान करने की चीज़ होती ही नहीं है, ये अपने आप होता है। ये प्रेम के जैसा है। जिस अवस्था में भूत, भविष्य और वर्तमान का बोध खो जाता है, उसे ध्यान कहते हैं। एक अवस्था होती है जागृति, दूसरी स्वप्न, तीसरी निद्रा, चौथी तुरिय। यह चौथी अवस्था ही वास्तव में ध्यान है।

आठवां अंग ~~~~ समाधि
अष्टांग योग का अंतिम और उच्चतम अंग समाधि कहलाता है। समाधि ध्यान की गहरी अवस्था है जिसमें विचार शून्य हो जाएं और अपना अस्तित्व भी खो जाये। जैसे बहुत गहरी नींद में हमें नहीं पता होता कि हम कौन हैं, कहाँ हैं? इस अवस्था में भूख प्यास, सर्दी गर्मी आदि का एहसास भी नहीं होता। रूप, रस, गंध, शब्द आदि पंच तन्मात्रा का बोध भी समाप्त हो जाता है।
समाधि 2 प्रकार की होती है,
संप्रगज्ञात समाधि
इसमें चित्त की राजसिक और तामसिक वृत्तियों का निरोध करके सात्विक वृत्तियों का उदय मात्र रह जाता है।
असंप्रगज्ञात समाधि
इसमें समस्त वृत्तियों का निरोध हो जाता है और दुबारा मृत्यु लोक में आना नहीं होता।

महर्षि पतंजलि को हम उनके अष्टांग योग के लिए हृदय से धन्यवाद देते हैं, उनको प्रणाम करते हैं। 🙇🏻‍♂

अस्तु 🙏
ईश्वर सबका कल्याण करें।

– प्रभात पांडे

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