” आध्यात्मिकता को जीने के लिए जंगल जाने की, या सन्यास लेने की क्या जरूरत है
ये तो गृहस्थी में भी बहुत आराम से पाया जा सकता है , बल्कि सन्यास से कहीं अधिक फल तो गृहस्थी में रह कर पाया जा सकता है, सन्यास तो एक तरह से दुनिया से पलायन है “
इस तरह की बातें अक्सर हमें पढ़ने या सुनने को मिलती हैं और बिना सोचे समझे हम इनसे सहमत या असहमत होने लगते है
तो आज हम विवेकपूर्ण दृष्टि से इस पर सोचते है
पहली नजर में पढ़ने पर तो ये बात बहुत सही और अच्छी लगती है, किंतु गहराई से सोचे तो ये इस तरह से कही जा सकती है
“आप बारहवीं पढ़ कर भी अच्छी नौकरी पा सकते हो इसके लिए आपको ग्रेजुएशन करने की या कंप्टीशन की तैयारी करने की क्या जरूरत है और बारहवीं कक्षा से जो नौकरी पाओगे तो ज्यादा श्रेष्ठ बात होगी”
अब शायद कम लोग ही इस बात से सहमत होंगे
मैं गृहस्थी को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं कर रहा ,
कृपया बात को गहराई से पकड़ें,
हम एकांत या सन्यास की तरफ क्यों जाते है
जब हमें किसी लेंस से, किसी कागज को जलाना होता है तो, उसको आगे पीछे करके, उसका फोकस कागज पर सेट करते है, तभी कागज जलता है अन्यथा नहीं
इसी प्रकार हमारी सभी इन्द्रियों को ईश्वरीय सत्ता पर जब तक हम फोकस नही करेंगे तब तक हम उस की झलक भी पाने में असमर्थ रहेंगे
आप कितने ही आत्मनिष्ठ बन जाओ लेकिन घर में सास बहु के झगड़े, भाई भाई के झगड़े, बाप बेटे का खिंचाव, जेठानी देवरानी की कलह इनसे कैसे मुंह मोड़ोगे
माना कि आपके परिवार में महान शांति है, तो भी रिश्तेदारों के दुख सुख में जाना, वहां उनके जीवन शैली में थोड़े ही देर के लिए सही, परंतु ढल जाना ही पड़ता है
बच्चो की तरह तरह की जिद और इच्छा के आगे आपको झुकना ही पड़ेगा चाहे वो आपके मन के अनुकूल न भी हो तो भी,
जिस तरह की सोसाइटी में आप रहते है उनके तौर तरीके आपको अपनाने ही पड़ेंगे
इतने सब दबावों और खिचावो के बीच आप अपनी सभी इन्द्रियों को कैसे परम सत्ता की तरफ केंद्रित करेंगे ?
तो क्या हम सबको घर बार छोड़ कर जंगल चले जाना चाहिए !!
बिलकुल नहीं!!
कुछ रास्ते है जिन्हे मध्यम मार्ग भी कह सकते है उनको अपनाना श्रेष्ठ है !
जैसे कार चलाना सीखना है तो थोड़े दिन किसी ट्रेनिग स्कूल में कार चलाना सीखते है जब हम सीख जाते है तब उस ट्रेनिंग में जाने की जरूरत नहीं होती
अगर हम सोचे कि नही, हम घर में रहते रहते यूट्यूब से देख कर कार चलाना सीख लेंगे तो ये आपका नितांत भ्रम ही रहेगा
अतः हमें कुछ दिनों के लिए किसी आश्रम में या एकांत स्थान पर रह कर अपनी इंद्रिय निग्रह पर काम करना चाहिए, पुनः अपने घर लौट कर उसका अनुपालन करते हुए ईमानदारी से स्वयं को परखे
कमी दिखने पर पुनः अभ्यास के लिए एकांतवास करें, बार बार के प्रयास से कुछ सालों में आप गृहस्थी में रहते हुए भी, स्वयं को साध पाने में समर्थ हो सकते हो
लेकिन सब के साथ ऐसा हो पाए ये जरूरी भी नही है
क्योंकि अधिकांश लोग आश्रमों में धार्मिक मनोरंजन के लिए जाते है ना कि स्वयं के ऊपर कार्य करने के लिए
इन जगहों पर पूर्णतः अकेले और किसी निश्चित लक्ष्य को लेकर ही जाना चाहिए जिससे कि कोई व्यवधान उत्पन्न न हो
जब एकांत में आप इंद्रियों को साधने का अभ्यास कर लें तभी समाज में आकर उनको जांचे
चूंकि ये सबके लिए सहज नहीं है इसीलिए वो लाइनें प्रचलन में आ गई जो शुरू में लिखी है
आप सभी गृहस्थी से बीच बीच में विराम लेकर स्वयं पर कार्य अवश्य करे ,
घर में रहते हुए मौन का पालन करे विचारो में दृष्टा भाव लाने का प्रयास करें,
मन को अधिक शांत और एकाग्र बनाने का प्रयास करे
कुछ स्वाध्याय अवश्य करे जोकि यथार्थ सनातन से जुड़ा हो
तभी गृहस्थी में रहते हुए भी आप सन्मार्ग पर जा सकेंगे
अस्तु….
भगवान हम सभी गृहस्थी वालो को घर में रहते हुए भी संन्यासियों जैसा बनने में मदद करें 🙇🏻♂🙏🏻
----- प्रभात पाण्डेय
