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परिधि से केंद्र की ओर

कई बार मैंने बोला, कि चलो परिधि से केंद्र की ओर लौटे
केंद्र से परिधि जितनी अधिक दूर होगी, उतना बड़ा चक्कर हमको लगाना पड़ेगा,
उतना अधिक ही हमको श्रम करना पड़ेगा,
उतनी ही अधिक रास्ते की कठिनाइयां हमें पकड़ेंगी
ज्यों ज्यों हम केंद्र के नजदीक आने लगेंगे , परिधि छोटी होती जायेगी
कम समय में एक चक्कर पूरा हो जाएगा
कम कठिनाइयों से पाला पड़ेगा

और मजे की बात ये है कि यदि हम किसी उपाय से केंद्र पर ही पहुंच जाएं, तो फिर हमे घूमने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी

क्योंकि परिधि अब शून्य हो गई, अब घूमने का कोई मतलब ही शेष नहीं रह गया

लेकिन ये कहने में जितना आसान करने में उतना नहीं है

हम जितना “मैं” बढ़ाएंगे उतना केंद्र से दूर जायेंगे और जितना मैं होगा समाज में उतनी ही पहचान होगी
समाज में उतनी ही पकड़ होगी ,
लोग उतना ही ज्यादा सम्मान कर रहे होंगे और दिन प्रतिदिन “मैं” बढ़ना ही चाहिए ऐसा हमारा प्रयास रहता है

कई बार हम जोश में कहते भी है तुम जानते नही, मैं कौन हूं, मेरी कहां तक पहुंच है, मेरा कितना रसूख है, मेरी साधना की कितनी ऊंचाई है

बात एक ही है, सात्विक अहम साधारण अहम से ज्यादा गंभीर है

साधारण अहम तो सत्संग और धार्मिकता के प्रभाव से खतम हो भी सकता है

लेकिन जो अहम, धार्मिकता के आचरण करने के दंभ के कारण आ गया हो, उसका तो उपाय भी मुश्किल ही है

केंद्र पर लौटने के लिए मैं को कमजोर करना पड़ेगा , अस्तित्व बोध घटाना पड़ेगा
जो कि सांसारिक रूप से हमे कमजोर सिद्ध कर सकता है

लेकिन जब हम अपने शरीर और मन से विलग होना शुरू करते है तो ये चीजे हमे गौण लगने लगती है

तो चलिए शुरुआत करते है पहला चरण नम्रता है,

परिधि पर ही आप रहोगे, लेकिन आपका झुकाव केंद्र की ओर शुरू हो गया है, उसकी पहचान नम्रता है

जीवन में कुछ बदलाव नहीं होगा लेकिन शुरुआत यही से है

कुछ लोग सारी जिंदगी यही अटके भी रह सकते है खास तौर से वे लोग जिनकी नम्रता दिखावटी है

वास्तविक नम्रता से शुरू करे, अगला पड़ाव जीवन में आने वाले बदलावों के प्रति समर्पण है,

जो भी हुआ और जो हो रहा है ईश्वर का दिया प्रसाद मान कर ग्रहण करे, उसमे कुछ भी बदलाव की इच्छा का न होना ही दर्शाएगा कि आप अगले पड़ाव पर है

तीसरी स्थिति आती है दृष्टा की , जो हो रहा है वो अब आपके शरीर के साथ हो रहा है आपके साथ नही,

जो जो घटना घट रही है वो आपके मन को विचलित न करे क्योंकि मन भी आपका नही है

धीरे धीरे प्रयास करते करते, गुरु सानिध्य और उनका आशीर्वाद प्राप्त होने से आप केंद्र के अति निकट जा सकते है

अवश्य ही ये अत्यंत कठिन है किंतु गुरु कृपा यदि हो तो ये असंभव नहीं है

अस्तु …..

गुरुदेव भगवान हम सब पर वरद हस्त रख आशीर्वाद प्रदान करें

    ~~~ प्रभात पांडेय
 

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