आजकल एक प्रचलन देखने में बहुत आ रहा है कि लोगों में ध्यान देर तक करने की एक होड़ सी मची है
एक कहता है कि मैं कम से कम 2 घंटे ध्यान करता हूं
दूसरा कहता है कि मैं तो 4 घंटे से कम कभी बैठता ही नही
तीसरा बोलता है कि 8 घंटे से कम ध्यान में मजा ही नही आता
कुछ तो ऐसे भी बिरले लोग है जो सारी रात ध्यान में बैठते है उनका कहना है कि 12 घंटे तो ध्यान होना ही चाहिए
कुछ लोग मुझसे भी यही प्रश्न करते है कि ध्यान में कितनी देर बैठना चाहिए
मैं हमेशा एक ही उत्तर देता हूं कि आपका प्रश्न ही गलत है
ये प्रश्न इस तरह से हुआ कि आप पूछो मैं अपने बच्चे से कितनी देर प्यार करूं ?
या उससे भी आगे बढ़ कर ये कि आप पूछो कि मैं कितनी देर बारिश करूं ?
तो मेरे मित्रो ध्यान करने की चीज होती ही नहीं , ये तो होने की चीज होती है
जैसे प्रेम किया नही जाता, हो जाता है
ये उमड़ता है और जब प्रेम उमड़ता है तो वो व्यक्ति ये नही पूछता कि मुझे प्यार उमड़ आया है अब कितनी देर प्यार करूं
ये संवेदना का खेल है, दिमाग से नही खेला जा सकता
ये भावना से जुड़ी बात है समय के तराजू पे कैसे तौलोगे ?
ये घंटो ध्यान करना ठीक वैसा हो गया जैसे आप बारिश की चाह रख रहे हो और पाइप लाइन ऊपर लगा कर उसमे देर सारे छेद करके उसमे से गिरती बूंदों को बारिश मान कर नहा लो
जो ओरिजनल बारिश होती है, उसके जैसी धरती से उठती सोंधी महक कहां से लाओगे?
वो बादलों का गरजना, वो बिजली का कड़कना कहां से पैदा करोगे ?
असली बारिश की नही जाती, हो जाती है
और आपको बारिश करना ही है तो ढेर से वृक्ष लगाओ, यानी सद्पुरुषों के शरण में जाओ
गुरु की शरण मे बैठो, अपने इष्ट के प्रति समर्पित हो जाओ
वहां से ही बारिश के होने की संभावना बनती है
प्रेम और ध्यान भाव प्रवणता का विषय है , कितनी देर हो इसका विषय ही नहीं है
अस्तु….
भगवान हम सब को विवेक दे 🙏🏻🙇🏻♂
~~~प्रभात पांडेय
