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डूबे तो पार

पत्थर सा निष्प्राण जीवन कोई जीवन है ?

हवा चले जोर से और पौधा न लहलहाए !!
बारिश हो झमक के, और पोर पोर न भीग जाए !!

आनंद बरसे और हम उसमे सराबोर न हो !!

अछूते दूर बैठे रहे 🤔

ऐसे नीरस प्राणहीन जीवन से जीवन का न होना ज्यादा श्रेष्ठ है …

कुछ झूठे सिद्धांतो ने हमे अंदर से द्वैत में डाल दिया है, जैसे

“आनंद आएगा तो , पर तुम लेना नही”,

क्या मतलब हुआ इस बात का ??

ये तो उस परम शक्ति का घोर अपमान है

और मान भी लो कोई परम शक्ति है ही नही, तो भी ये अस्वाभाविक अवस्था है

चिड़िया, पक्षी, फूल इन्होंने ऐसे कोई नियम बनाए है क्या ?

जैसे फूल सोचे कि हमे कांटे नही चाहिए
या मेरी सुगंध पूरे विश्व में फैलनी चाहिए

चाहना से दूर बस स्वाभाविकता से जीना ही हमें सीखना है…

शुरुआत अपने भावों के साथ बहने से ही करनी पड़ेगी
बाद में आप दृष्टा भाव में जा सकते हो

माना आप बहुत भूखे हो और बहुत अच्छे अच्छे व्यंजन बने है आपको ही सारे मेहमानों को परोसना है,

लेकिन खाना बिलकुल नहीं खाना है उसकी तरफ देखना भी नही है बिलकुल ललचाना भी नही है

ये बिलकुल अस्वाभाविक बात है,

हमें भी उनका स्वाद मेहमानों के साथ लेना चाहिए

पेट भरने के बाद जब आप तृप्त हो, तब और मेहमान आ जाएं और खाने में व्यस्त हो तो आप उनको दृष्टा भाव में बड़े आराम से देख सकते हो

डूब के ही पार उतरने का रास्ता है
उड़ कर नदी पार नहीं होगी

अस्तु ……

जो व्यवहारिक जीवन ठीक से न निभा सके वो आध्यात्मिकता क्या निभा पाएगा 🙇🏻‍♂🙏🏻

…………………….. प्रभात पाण्डेय…………….

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