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कुछ दिल की बात

प्रिय आत्मीय जनों

कुछ दिल की बात

कुछ आज मन मे आया सोचा आप सबसे शेयर करूँ
जितने भी सिद्ध , पूर्ण आध्यात्मिक व्यक्ती हुए , चाहे वो कबीर हो, तुकाराम हो, मीरा हो, रामकृष्ण परमहंस हो, लाहिड़ी महाशय हो, या अन्य कोई ….

इनमे क्या कॉमन दिखता है ?

सिर्फ दो बातें

  1. भगवान या परम शक्ति के प्रति गहरी आस्था/ रुचि
  2. किसी एक ही पद्धति का सहारा

अब मेरा मानना ये है कि यहां जो भी लोग है उनकी भगवान में रुचि तो अवश्य है अब वो गहरी है या नहीं वो सब का अलग अलग विषय हो सकता है
मुख्य बात दूसरी है
बुद्ध जी हो या नानक जी या ऊपर लिखे कोई भी सिद्ध
इन्होंने अनेकों रास्तों को नहीं अपनाया
हर मार्ग पर निष्ठा से चल कर प्रभु को पाया जा सकता है
शर्त केवल निष्ठा / समर्पण की है
हम सब बहुत जल्दबाजी में है हर 2 से 6 महीने में नई कोई पद्धति सीख कर उस पर लग जाते हैं

वस्तुतः हम भगवान को पाना भी चाहते है या अनेकों चीजें सीख कर उसको अन्य को सिखा कर पैसे पैदा करने की चाह में है

हमें खुद को ठीक से चेक करना पड़ेगा
आप किसी को भी धोखा दे सकते हो पर खुद को नहीं

बहुत से समस्या ग्रस्त लोग भी अध्यात्म में इस लालच से आते है कि मेरी फलां समस्या दूर हो जाएगी
या फलां बाबा जी के आशिर्वाद से मेरे दुःख दूर हो जाएंगे
तो ऐसे लोग आध्यात्मिक तो नहीं कहे जा सकते, क्योंकि ऐसे कई लोगों को मैंने देखा है जिनके दुःख दूर होते ही वो धार्मिकता से दूर चले गए

तो मेरा अपने लोगों से आग्रह है कि पहले शास्त्रों को पढ़िए 🙏🏻

ये जो social media पर फालतू के उल्टे पुल्टे ज्ञान लोग दे रहे है वो बिल्कुल भी प्रामाणिक नहीं है शास्त्र ना पढ़ने के कारण लोगों को समझ भी नहीं है कि क्या गलत क्या सही

अगर शास्त्र भी नहीं पढ़ सकते तो आप मात्र इतना तो करो कि किसी एक गुरु के पीछे खड़े हो जाओ उसके चरण पकड़ लो

केवल नाम स्मरण भी कर लोगे तो भी कल्याण हो जाएगा

कहीं टिक के बैठो तो 🙏🏻

किसी एक पद्धति को 3 से 4 साल करो तो

हर 6 महीने मे चीजें बदल बदल कर करने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है

मेरा ये कहना बिल्कुल नहीं है कि आप केवल मेरे पास ही रहो

मैं ये कह रहा हूं कि किसी एक जगह पर ही निष्ठा को लगाओ
10 जगह की गई भक्ति को भी व्यभिचारी भक्ति कहते है

एकलव्य ने जो गुरु किया उसको मिला भी नहीं , उसको छोड़ा भी नहीं ,

बस उसकी मूरत पर ही अपनी निष्ठा को लगा दिया
और पा गया जो पाना था

तो अंत मे पुनः 2 बातों को दोहराता हूं

  1. भगवान मे बिना किसी स्वार्थ के आस्था प्रेम रखिए
  2. किसी एक ही रास्ते का चुनाव कीजिए , भटकने की कोई जरूरत नहीं है, हर मार्ग वहीं तक जाता है उन रास्तों का आपस मे घालमेल मत कीजिए

……………………………. प्रभात पाण्डेय…………….

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