इन काम करने वाले लोगों ने,
इन अति कर्मवादी लोगों ने,
जिनको लगता है कि काम ही सब कुछ है, उन्होंने भारी नुकसान पहुंचाए हैं हमारे समाज को।
प्रमुख नुकसान तो इन्होंने ये पहुंचाया है कि जिंदगी से उत्सव के क्षण ही छीन लिए हैं।
दुनिया में उत्सव कम होते जा रहे हैं।
रोज कम होते जा रहे हैं।
उत्सव की जगह मनोरंजन आता जा रहा है, जो कि बिलकुल भिन्न बात है।
उत्सव में स्वयं सम्मिलित होना पड़ता है,
मनोरंजन में दूसरे को सिर्फ देखना पड़ता है।
मनोरंजन “पैसिव’ है,
उत्सव बहुत “एक्टिव’ है।
उत्सव का मतलब है, हम नाच रहे हैं।
मनोरंजन का मतलब है, कोई नाच रहा है, हमने चार पैसे दिए और देख रहे हैं।
लेकिन कहां नाचने का आनंद और कहां नाच देखने का आनंद। कोई तुलना ही नही है
इतना ज्यादा काम हमने कर लिया है कि शाम को हम थक जाते हैं,
तो किसी को नाचते हुए देखना चाहते हैं। रील देख कर खुद को भुलाना चाहते है
थोड़ा ठहरो, रुको , एक मिनट के लिए सोचो इस काम की परिणति क्या है
हम कब उत्साहित होंगे ???
आनंद कब बरसेगा ????
जब हम जीवन को समग्र दृष्टि से कब देख पाएंगे ??
इसके लिए हमे जागरूक होकर स्वयं को देखना होगा ,
हमें खुद नाचना होगा
हमें उत्साहित उल्लासपूर्ण होना होगा
हमे ध्यान में उतरना होगा
खुद से संवाद स्थापित करना होगा
अस्तु…..
हम सभी मनोरंजन को त्याग कर उत्सव मना सकें ऐसी सद्बुद्धि सबको प्राप्त हो 🙏🏻
~~~ प्रभात पांडेय
