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आध्यात्मिक यात्रा (Part 6)

अनेकों लोगों को आपने ध्यान करते देखा और सुना होगा
वे स्वयं को आध्यात्मिक मानते है और उनके आसपास के लोग भी ….

लेकिन जब हम उनके साथ लगातार रहते है तो लगता है ये अभी साधारण मानवीय स्तर पर भी नहीं है
वो स्वयं भी ये जानते है और कई बार खुद से भी प्रश्न करते है कि इतना ध्यान साधना करने के बाद भी मेरे अन्दर बदलाव क्यों नहीं है

फिर वो इसको माया का प्रपंच मानकर खुद को संतुष्ट कर लेते है

आध्यात्मिकता मात्र ध्यान करने से नहीं आती ये बात अधिकांश लोगों की समझ में नहीं आती

अधि + आत्मिक

आत्मा के निकट
आत्मा के निकट जाने का एक निश्चित प्रावधान है एक निश्चित क्रम है
मानवीय गुण, फिर धार्मिक जीवन उसके बाद आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है
प्रायः लोग सीधे आध्यात्मिक होना चाहते है या अन्य कि देखा देखी शुरू हो जाते है कोई ना कोई तथाकथित साधना आदि मे

अपने को ठीक से पहचानने की यात्रा का नाम आध्यात्मिकता है

जब तक हम खुद के शरीर मात्र को ही स्वयं समझते रहेंगे ये यात्रा शुरू भी नहीं होगी
शरीर के अंदर कोई और है, जो शरीर से भिन्न है ये बोध जब शुरू होगा तब ये यात्रा शुरू होगी

उससे पहले हम आंख बंद करके ढोंग कर सकते है

कुछ लोग इस वहम मे भी हो सकते है कि हम अनेकों वर्ष रोज ध्यान करें तो एक ना एक दिन आत्म जागृति को प्राप्त कर लेंगे
तो मैं कहूँगा ये भ्रम मन से निकाल दीजिए

ऐसे बहुत लोगों से मेरा परिचय है जो ध्यान की ऐसी अवस्था को प्राप्त है जिसमें शरीर मे बहुत स्पन्दन और विकट ऊर्जा प्रवाह होता है
किन्तु उनके व्यक्तिगत जीवन मे कोई विशेष अन्तर दिखाई नहीं देता

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार ज्यों के त्यों है और साधारण मानवीय गुण उनके जीवन मे नही है उनका खुद का परिवार उनसे पूर्णतः असंतुष्ट है
लेकिन ऐसे लोग शास्त्रों से ऐसे उदाहरण लाते है कि जो सन्मार्ग पर बढ़ता है उसके सगे संबंधी से नाता टूट ही जाता है
लेकिन वो आत्म स्वीकृति नहीं कर पाते कि उनके हृदय मे अभी करुणा और सहयोग का भी उदय नहीं हुआ है
हम सभी ठीक क्रम से अपने को परिशोधित करते हुए आगे बढ़े ऐसी भगवान से प्रार्थना है

अस्तु….
सम्पूर्णम

           ~~~ प्रभात पांडेयअनेकों लोगों को आपने ध्यान करते देखा और सुना होगा 
वे स्वयं को आध्यात्मिक मानते है और उनके आसपास के लोग भी ....

लेकिन जब हम उनके साथ लगातार रहते है तो लगता है ये अभी साधारण मानवीय स्तर पर भी नहीं है 
वो स्वयं भी ये जानते है और कई बार खुद से भी प्रश्न करते है कि इतना ध्यान साधना करने के बाद भी मेरे अन्दर बदलाव क्यों नहीं है 

फिर वो इसको माया का प्रपंच मानकर खुद को संतुष्ट कर लेते है 

आध्यात्मिकता मात्र ध्यान करने से नहीं आती ये बात अधिकांश लोगों की समझ में नहीं आती 

अधि + आत्मिक 

आत्मा के निकट 
आत्मा के निकट जाने का एक निश्चित प्रावधान है एक निश्चित क्रम है 
मानवीय गुण,  फिर धार्मिक जीवन उसके बाद आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है 
प्रायः लोग सीधे आध्यात्मिक होना चाहते है या अन्य कि देखा देखी शुरू हो जाते है कोई ना कोई तथाकथित साधना आदि मे 

अपने को ठीक से पहचानने की यात्रा का नाम आध्यात्मिकता है

जब तक हम खुद के शरीर मात्र को ही स्वयं समझते रहेंगे ये यात्रा शुरू भी नहीं होगी 
शरीर के अंदर कोई और है, जो शरीर से भिन्न है ये बोध जब शुरू होगा तब ये यात्रा शुरू होगी 

उससे पहले हम आंख बंद करके ढोंग कर सकते है 

कुछ लोग इस वहम मे भी हो सकते है कि हम अनेकों वर्ष रोज ध्यान करें तो एक ना एक दिन आत्म जागृति को प्राप्त कर लेंगे 
तो मैं कहूँगा ये भ्रम मन से निकाल दीजिए 

ऐसे बहुत लोगों से मेरा परिचय है जो ध्यान की ऐसी अवस्था को प्राप्त है जिसमें शरीर मे बहुत स्पन्दन और विकट ऊर्जा प्रवाह होता है 
किन्तु उनके व्यक्तिगत जीवन मे कोई विशेष अन्तर दिखाई नहीं देता 

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार ज्यों के त्यों है और साधारण मानवीय गुण उनके जीवन मे नही है उनका खुद का परिवार उनसे पूर्णतः असंतुष्ट है 
लेकिन ऐसे लोग शास्त्रों से ऐसे उदाहरण लाते है कि जो सन्मार्ग पर बढ़ता है उसके सगे संबंधी से नाता टूट ही जाता है 
लेकिन वो आत्म स्वीकृति नहीं कर पाते कि उनके हृदय मे अभी करुणा और सहयोग का भी उदय नहीं हुआ है 
हम सभी ठीक क्रम से अपने को परिशोधित करते हुए आगे बढ़े ऐसी भगवान से प्रार्थना है 

अस्तु....
        सम्पूर्णम

               ~~~ प्रभात पांडेय

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