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आध्यात्मिक यात्रा (Part 5)

मानवीय गुणों मे हमारे अंदर देने का भाव होता है

स्नेह देते है
करुणा देते है
प्रेम देते हैं
सहयोग देते हैं

तो जब हम वास्तविक धार्मिक होते है तो मांगने का भाव हो ही नहीं सकता
वो भी सांसारिक चीजें??

हाँ हम प्रभु चरणों की भक्ति मांग सकते है
उनके प्रति अनुराग मांग सकते है
आत्म कल्याण मांग सकते है

वास्तव में धर्म मे कुछ मांग है ही नहीं
हम ईश्वर की शरण मे है बस …

उनके दास है उनका दिया कार्य , उनके लिए ही कर रहे है

भगवान स्वयं गीता जी मे कहते है
सब कुछ छोड़कर एकमात्र मेरी शरण मे आ जाओ

इससे अधिक स्पष्ट बात और कहाँ सुनने को मिलेगी

हम उनके ही अंश है, ये जगत उन्हीं का है हम जो भी कार्य कर रहे है उनकी राजी खुशी के लिए कर रहे है सदा यही भाव बना रहे यदि धर्म है

यदि हम कुछ भी मांगते है तो ये भगवान का अपमान है

कैसे ??

हमे लग रहा है कि शायद भगवान ठीक नहीं कर रहे
यानी आप भगवान के काम को सुधारने की बात कर रहे हों , अर्थात आपको ईश्वर से ज्यादा समझ है

ये उस परमपिता का अपमान है !!

उसकी व्यवस्था मे कोई खोट हो ही नहीं सकता ये दृढ़ भाव रखिए
जो भी आपके साथ हो रहा है वो उसकी व्यवस्था के अनुसार है
आप सिर झुका कर सहर्ष उसमे शामिल हो यही धर्म है

आपको मात्र ध्यान अपने कर्तव्यों का रखना है उसमें कोई चूक नहीं होनी चाहिए

अस्तु ……
आज इतना ही, शेष कल

           ~~~ प्रभात पांडेय

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