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आध्यात्मिक यात्रा (Part 3)

सास ,बहू से परेशान है
बहू, सास से परेशान है
ननद, भाभी से परेशान है
भाभी, ननद से परेशान है
पति की पत्नी से नोकझोंक है
पत्नी पति से दुःखी है
भाई, दूसरे भाई से झगड़ रहा है
पड़ोसी की पड़ोसी से पटरी नहीं बैठ रही
बास मातहत से परेशान है
मातहत अपने बास से दुःखी है
किसी को नौकरी की तलाश है
किसी की शादी नहीं हो रही
किसी की बीमारी ठीक नहीं हो रही

सबके मन मे किसी ना किसी तरह का कोई सामाजिक क्लेश है

और इस क्लेश का कोई निदान लोगों को जब नहीं सूझता, तो वो किसी अति मानवीय सत्ता के पास समाधान को पहुचते है

वो सत्ता उनके अनुसार कोई साधु बाबा हो सकते है ,
कोई आश्रम हो सकता है ,
कोई मंदिर हो सकता है,
अन्य कोई सिद्ध स्थान हो सकता है

मनुष्य जब अपने सामर्थ्य और विवेक से कुछ हल नहीं कर पाता तो सोचता है कि इस को धर्म के द्वारा सुधारा जा सकता है

कर्म कांड , व्रत अनुष्ठान, आदि के पीछे मंतव्य प्रायः कोई समस्या समाधान ही होता है

अधिकांश तथाकथित धार्मिक लोगों के मन मे धर्म के द्वारा मात्र ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा नहीं होती

अधिकांशतः कोई लौकिक इच्छा होती है

इस तरह हम धर्म की आड़ मे अपनी किसी अपूर्ण इच्छा को किसी अति मानवीय सत्ता के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं

और हम मान लेते है कि हम धार्मिक है धर्म धारणा से व्युत्पन्न हुआ शब्द है
हमारे व्यक्तित्व मे वहीं परिलक्षित होगा जो हम वर्षो से अपने मानस और वर्तन में धारण किए होंगे
धर्म केवल पूजा पद्धति से संबंधित नहीं है
सामाजिक दायित्वों के सही से निर्वाहन के साथ हम आत्म उन्नति के मार्ग पर कैसे बढ़े ये धर्म हमको सिखाता है
तो धर्म को भलीभांति हम समझे और वास्तविक धार्मिक बने ना कि केवल किसी समस्या के समाधान के निमित्त धर्म की शरण मे जाये

अस्तु…..
आज इतना ही, शेष कल 🙏🏻

                 ~~~ प्रभात पांडेय

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